पर्व किस बात का
गर्व किस बात का
चुनना जब उन्हें जो
जो कुछ दे नहीं सकते
ले सकते हैं हमारा वोट
चूसने को हमारा ही खून

इतना तामझाम क्यों
कहने को काम क्यों
चुनना जब उनको है
जो जनता के नाम पर
जनता से लूटकर
अपना पॉकेट भरें

क्यों करें बर्बाद हम
रोटियों का स्वाद हम
वोट देने के लिए
कतार में खड़े रहे
अपराधियों को वोट दें?
आओ एक नोट दें
और उनसे ये कहें
मत लड़ो तुम चुनाव
घर बैठो,रोटी खाओ

शिक्षित हैं बेरोजगार
बनाओ उनको उम्मीदवार
जिसकी एक सोच हो
तब मनाऐंगें सभी
मिलकर चुनाव पर्व

लेकिन तबतक भला
पर्व किस बात का
गर्व किस बात का
चुनना जब उन्हें जो
जो कुछ दे नहीं सकते
ले सकते हैं हमारा वोट
चूसने को हमारा ही खून

उस दिन में बस के इंतज़ार में बस अड्डे पर खड़ा था.....तभी दिखने में हट्टा कट्टा वो शख़्स एक बुजूर्ग सी दिखने वाली महिला के साथ सामने आ खड़ा हुआ....और कहने लगा...भाई साहब...घर जा रहा था...सारा सामान चोरी हो गया.....एक पचास रूपए दे दीजिए.....थोड़ी मदद हो जाएगी....भगवान आपकी बहुत मदद करेगा.....मैंने अनमने ढंग से अनसुना कर दिया.....दूसरे तीसरे बार वही आवाज सुनाई पड़ी तो दिल पसीज गया.....सोचने लगा...लगता है सचमुच मुसीबत में है ...अन्तर्मन ने कहा तुम्हें मदद करनी चाहिए...हाथ अनायास पॉकेट की तरफ बढ़े...एक दस का नोट निकाला और बढ़ा दिया........उसने और रूपयों की मांग की...पर मैंने मना कर दिया......देना चाहता था कि दे दूं पचास रूपए...किसी और से मांगने की बेचारे को नौबत न आए....पर ऐसा कई बार सुन रखा था कि हट्टा कट्टा से दिखने वाले लोग भी बहानेबाजी कर भीख मांगते हैं......ज्यादा देने की हिम्मत नहीं हुई......बस में सोचता रहा कि क्यों नहीं उसे पचास रूपए दे दिए.......बात आई गई हो गई...मैं भी भूल सा गया ...उस वाकये को ...लेकिन उस दिन भी बस से ऑफिस जा रहा था.......ग़ाजीपुर बाईपास के करीब एक बस स्टॉप पर मैंने देखा तो मुझे सहसा यकीन न हुआ.....मुझे ठीक से याद है वही शख़्स था....जिसने सारा सामान चोरी हो जाने की बात कह मुझसे पचास रूपए मांगे थे.....एक बच्ची और एक महिला के साथ मिलकर इकट्ठा पैसे के लिए लड़ाई कर रहा था......मैं सोच में पड़ गया कि आख़िर किसे जरूरतमंद समझा जाए........

रात को घर लौटते समय बस छूट गई ...मैं ऑटो से उतर ही रहा था कि बस आई और चली गई....मन खट्टा हो गया...आज फिर घर पहुंचने में देर हो जाएगी...बिटिया रोज कहती है जल्दी आने के लिए...आज मौका था लेकिन कमबख़्त...बस का क्या करें......तभी करीब एक ऑटो आकर रुका.....मोहननगर....मोहन नगर.....मेरा स्टॉप तो रास्ते में ही पड़ता है....पूछता हूं...ये सोचकर मैंने ऑटो वाले से पूछा भैया वसुंधरा जाओगे क्या.....हां जाऊंगा पर दस रूपए लगेगें....चलो ...इतना कहकर मैं ऑटो में बैठ गया...एक दो और सवारी बैठ गए....ऑटो चल पड़ी...रास्ते में ऑटो चालक और सवारियों के लिए आवाज़ लगाता जा रहा था.......खोड़ा के पास एक सवारी....जो दिखने में सिक्योरिटी गार्ड सा लग रहा था...ने हाथ दिया....डाबर चलोगे क्या...हां....कितना लोगे....अनमने ढंग से ऑटो चालक ने कहा...जितना देना हो दे देना.....अब ऑटो पुरी रफ़्तार से चल रही थी...घर पहुंचने की मुझे भी जल्दी थी...खुश था मैं....देखते ही देखते डाबर आ गया....एक सवारी उतर गया और उसने तीन रूपए ऑटो ड्राइवर की ओर बढ़ाया....ये क्या है....तीन रूपए...जवाब मिला.....क्यों कम से कम पांच तो दे...बस नहीं है ऑटो में लाया हूं....भइया कहो तो एक रुपया और दे दूं........इससे ज्यादा नहीं दूंगा......इतना कहकर उस सिक्योरिटी गार्ड सा दिखने वाले गरीब सवारी ने दो रूपए का सिक्का ऑटो चालक की ओर बढ़ा दिया.....लेकिन ये क्या ऑटो चालक तो चल पड़ा बिना एक रूपया वापस किए....लेकिन तभी वो सवारी बीच सड़क पर ऑटो के सामने खड़ा हो गया.....अरे मेहनत पसीने की कमाई है...एक रूपइय्या लेकर भाग रहे हो दे दो....नहीं तो ठीक नहीं होगा....ऑटो वाला देने को तैयार नहीं था....और सवारी लेने पर आमादा....जान दे दूंगा लेकिन एक रूपया लेकर रहुंगा....दिनभर जानवर की तरह खड़ा रहता हूं तब रूपल्ली मिलती है....ऐसे जाने नहीं दूंगा....किसी पैसेंजर ने कहा ...पागल है...दे दो....आख़िरकार ऑटोवाले ने एक रूपए का सिक्का उसकी ओर फेंका...और चल पड़ा....मैं सोचने लगा...वो पागल कतई नहीं था....मेहनतकश था...जिसे एक एक रूपए की कीमत मालूम है......इसी सोच विचार में मेरा स्टॉप आ गया....और मैं उतर गया.....

नए साल में मत भेजो संदेश
नववर्ष मंगलमय हो
भेजो ..एक तरीके का संदेश
कैसे हो मंगलमय नूतन वर्ष
कैसे रहें सभी हम सब सहर्ष
कैसे फलित होता रहे हम सबका संघर्ष

नए साल में मत भेजो संदेश
नववर्ष में खुशियां मिले अपार

लिखकर भेजो कैसे रखें सहेजकर
छोटी छोटी खुशियों भरे अनमोल पल
न पड़े हमारे तुम्हारे सबके जीवन में
आतंकवाद का खलल
राजनीति कैसे न बने
प्रजातंत्र के लिए दलदल
न हो कोई ऐसी घटना
दुर्घटना,जिससे हो मन भाव विह्वल

नए साल में मत भेजो संदेश

जब अपना ही बसेरा उजड़ जाए तो आदमी ये सोचने को मजबूर हो जाता है कि अब जाएं तो जाएं कहां.....करें तो क्या करें.....औरैय्या में पीडब्ल्यूडी इंजीनियर मनोज गुप्ता की हत्या महज़ किसी एक अधिकारी या इंजीनियर की हत्या नहीं...ये हत्या है सामाजिक व्यवस्था की.........ये बानगी है कि हमारी राजनीतिक व्यवस्थाएं कितनी खोखली हो गई हैं..........ये जाहिर करता है कि विकलांग हो गई है विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र का तंत्र......इस हत्या से एक के बाद एक कई गंभीर सवाल समाज के सामने दागने शुरू कर दिए हैं.....इस हत्या के बहाने राजनीति निर्वस्त्र हो गई दिखती है......और भीख मांगता...गिड़गिड़ाता प्रशासन......ये घटना ये बताने के लिए काफी है कि समाज में रहना है तो समझौता करना सीख लो...या बागी बन जाओ.....शहीद होने के लिए तैयार हो जाओ....एम के गुप्ता की तरह........जिसकी मौत पर राजनीति होती है......सस्ती..घटिया राजनीति.....राजनीति वोट की....राजनीति नोट की......और राजनीति सत्ता पर चोट की.....मैं किसी को इमानदार नहीं कहता.....किसी को नहीं.....लेकिन चंद रूपयों के लिए किसी की मौत का सौदा किसी भी कीमत पर नहीं होना चाहिए.....चाहे कुछ भी हो जाए......क्योंकि किसी बसेरे (घर ) के मालिक की हत्या या मौत से.....बसेरा टूट जाता है...बिखर जाता है....जैसे आंधी -तूफान में कोई झोपड़ी...या कोई कागज़ का टुकड़ा.......इंजीनियर का बसेरा ऐसे ही उजड़ चुका है.....बिखर चुका है.....उस बसेरे में रहने वाले लोगों की जिंदगी एक दिन में बदल गई....मुस्कुराहटें आंसुओं में तब्दील हो गई.....और जिंदगी के सपने सिमट से गए....ये अलग बात है कि वक्त हर जख़्म भरने की कोशिश करता है...जख़्म भर भी जाते हैं लेकिन ताउम्र दाग़ रह जाता है ...और रह जाती है वक्त के साए में यादें.....जिंदगी भर के लिए......
अब लगता है राजनीति संवेदनहीन हो गई है.....लोग अगर संवेदना दिखाते भी हैं तो सिर्फ दिखावे के लिए...अपने फायदे के लिए.....ये जताने के लिए कि हम हैं.....औरैया में इंजीनियर की हत्या के बाद यूपी में विपक्ष अचानक जीवित हो गई....धरना- प्रदर्शन,बंद,चक्काजाम, तोड़फोड़, गिरफ़्तारियां...मृतक के परिजनों से मुलाकात.....का दौर शुरू हो गया......मुख्यमंत्री को तो मानों पीसी करने का बहाना मिल गया......दूसरी पार्टियों को भी खबरों में बने रहने का......लेकिन इन सबमें अगर कुछ नहीं दिखा तो संवेदना.......मुआवजे की घोषणा,सीबीआई जांच की मांग ......मांग से इंकार......आरोपी बीएसपी विधायक की गिरफ़्तारी.....तफ्तीस....इन सबमें हर तरफ अगर कुछ नहीं दिखा तो संवेदना......विपक्ष को मुख्यमंत्री पर हमला करने का मौका मिला....दूसरी पार्टियों को बीएसपी की आलोचना करने का......और इस सबमें बेचारे बन गए उस बसेरे के लोग...जिनका अपना उनसे बिछड़ गया.....
सूबे का राजपाट संभालने वाली सीएम को हत्या में साज़िश दिखती है क्योंकि उसमें उनका एक एमएलए शामिल है...नहीं होता तो कतई नहीं दिखती...तब शायद बिना शर्त सीबीआई जांच के लिए तैयार हो जातीं....लेकिन बात पार्टी की साख की है....भले जनता भाड़ में जाए...वैसे भी राजनीति में अब जनता की फिक्र किसी को नहीं फिर मैडम माया क्यूं करें.....और जब सूबे की पुलिस जांच करेगी तब सबकुछ अपने मनमाफिक ही तो होगा.....वक्त के साथ पुलिस एक दिन बीएसपी विधायक को भी पाक साफ कह दे तो ताज्जुब नहीं होनी चाहिए.......लेकिन बात फिर भी वहीं की वहीं है.....एक घटना कुछ समय के लिए हम सबको स्तब्ध कर देती है लेकिन फिर वही पुराना राग....वही पुराना ढर्रा .....वही लोग वही काम....वही चंदा उगाही....वही चंदा देने वाले.....वही ठेकेदार...वही नेता...अफसर....सबकुछ वही......सोच लीजिए....जाएं तो जाएं कहां.......

मेरे एक पड़ोसी हैं....नाम लूं...चलिए...नहीं लेते हैं...बेचारे खफ़ा हो जाऐंगे....पड़ोसी हैं तो हर छोटी बड़ी बात पर चर्चा भी हो जाती है...इन दिनों पिछले कई दिनों से एक टेलीविजन सीरियल "उतरन" पर गंभीर चर्चा कर रहे हैं.....हम भी उसमें दिलचस्पी ले रहे थे क्योंकि विषय बड़ा ही संजीदा था...सीरियल में एक नौकरानी की बेटी मालकिन की बेटी के साथ खेलती है...उसे नहीं पता कि उसमें और मालकिन की बेटी में क्या फर्क है...वो भी उसकी तरह घुमना चाहती है...मॉल जाना चाहती है....वो सबकुछ करना चाहती है जो...मालकिन की बेटी करती है.....जाहिर है मालकिन इससे ख़फा खफ़ा सी रहती है.....और फिर सीरियल में एक पात्र आती है...नानी.....नानी है तो अनुभव भी होगा....अनुभव..जी तजूर्बा.....और फिर नौकरानी की बेटी को खुश करने के लिए नामी नए नए तरकीब निकालने लगी....पुराने कपड़े...खिलौने देकर नौकरानी की बेटी से पिंड छुड़ाने की कोशिश करने लगी.....अब साहब हमारे पड़ोसी हर रोज यही कहते...देखिए....इंसानियत का तो जो जमाना ही नहीं है.....एक नौकरानी की बेटी ....मालकिन की बेटी के साथ खेल भी नहीं सकती.....मैं तो ऐसा न करूं...इंसानियत भी कोई चीज़ होती है.....जूठे बचे खाने किसी को न दूं.....ये गलत है.....

दो तीन दिन गुजर गए....एक दिन पड़ोसी साहब की मिसेज ने एक स्वेटर अपनी नौकरानी को दी....स्वेटर दिखने में अच्छी थी...लेकिन थी ?....और तो और देते वक्त कहा गया मंहगी है...लेकिन मैंने सोचा कि दीवाली पर कपड़े नहीं दिए...तो चलो इस जाड़े में एक अच्छा सा स्वेटर ही दे दूं.....नौकरानी खुश...मालकिन ने इतना ख़्याल रखा....उत्साह में मेरे घर मेरी पत्नी को दिखाने आई ...मेम साहब ......आपकी पड़ोसन ने ये मंहगी स्वेटर दी है मुझे.....पांच सौ से कम की नहीं लगती न मेमसाहब......
मेरी पत्नी ने लंबी सांस लेकर हम्म्म्म्म्म्म् .....................कहा....उसके जवाब पर मुझे थोड़ी नाराज़गी हुई.....थोड़ा खुश होकर कह देती ..बढ़िया है.....तो क्या बिगड़ जाता......लेकिन जब हकीकत पता चली तो पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई...स्वेटर वीकली हाट से सत्तर रूपए में खरीदी गई थी......

बस में भीड़ रोज की तरह थी....हर स्टॉप पर दो चार नए पैंसेंजर चढ़ते ...तो एक दो उतर रहे थे.....तभी कंडक्टर की आवाज़ सुनाई दी...टिकिट ...टिकिट ले लो....हां भईया कहां जाना है......कासना...और युवक ने दस रूपए का नोट कंडक्टर की ओर बढ़ा दिया...पांच रूपए और दो...पंद्रह रूपिया किराया है......युवक ने फुसफुसाते हुए कहा...रख लो...इतने में ही जाता हूं......जाता हूं मतलब...पांच और निकाल...कंडक्टर ने कड़कती आवाज़ में कहा.....अबे ..पांच नहीं देता...जो करना है कर लो....ज्यादा बोला...तो दूंगा एक जमा के...मादर....कंडक्टर सहम कर आगे बढ़ गया......बस अपनी चाल में रुक रुककर चली जा रही थी..........दो तीन लोगों को टिकट देने के बाद कंडक्टर एक बुजूर्ग यात्री के पास पहुंचा....बाबा...कहां जाना है.......ग्रेटर नोएडा.....जवाब मिला...और सात ही थरथराते हाथ...जिसमें पैसे थे.....ये क्या है.....पांच और.....क्यों इतना ही तो किराया है....भई हर रोज जाता हूं.....जाता हूं से मतलब पांच और निकाल .....बेटा किसी से पूछ लो...कोई बोल दे तो ले लो.....बस मेरी है...कंडक्टर मैं हूं...किसी और से क्यों पूछ्छूं....पांच निकालल..नहीं तो उतर जा.....बुढ़े ने कहा....बेटा तुम्हारे जैसे मेरे नाती पोते हैं...तमीज़ से बात तो कर.....बाबा...तमीज से गड्डी नहीं चलती.....पांच निकाल वर्ना उतर जा.....बूढ़े बाबा ने पांच की हरी पत्ती निकाल कर कंडक्टर को देने में ही भलाई समझी...अब इस उमर में बीच रास्ते में बस से उतरना भी ठीक नहीं......