करीब पच्चीस साल बाद भोपाल के यूनियन कारबाईड कंपनी से गैस रिसाव की बड़ी घटना के लिए दोषी लोगों को सुनाया गया सिर्फ दो साल की अधिकतम सजा...ऐसी सजा जो गैर जिम्मेदार तरीके से सड़क पर वाहन चलाने वालों को दी जाती है.....इसके लिए हम अपने न्यायपालिका को दोष दें या फिर सरकारी मशीनरी की....जिसके लिए पच्चीस हजार लोगों की जिंदगी कोई मायने नहीं रखती.....एक पीढ़ी के मानसिक और शारीरिक रुप से विकलांग होने की स्थिति शायद उतनी गंभीर नहीं है....फैसले का टीवी चैनलों और मीडिया माध्यमों को जितना बेसब्री से इंतजार था उससे ज्यादा बेकरार थे गैस पीड़ित....और उनके परिजन, जिन्हें वारेन एंडरसन, केशव महिन्द्रा समेत सभी आरोपी किसी दरिंदे से कम नहीं दिख रहे थे.....उनकी आंखें कड़ी से कड़ी सजा सुनने के लिए आतुर थीं....लेकिन जब जज साहब ने फैसला सुनाया तो एकबारगी उनके पैरों तले की जमीन खिसक गई.....मीडिया को बहस का मौका मिल गया लेकिन गैस पीड़ितों और उनके परिजनों के दिलों पर सांप लोटने लगा.....उन्हें लगा मानो न्यायपालिका ने उनकी बेबसी, उनके दुख दर्द का भद्दा मजाक उड़ाया है......तभी तो कानून मंत्री तक को ये कहने पर मजबूर होना पड़ा कि फैसले में न्याय दफन हो गया है.......सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस जो भी कहें लेकिन हकीकत तो यही है कि भोपाल गैस कांड के फैसले ने ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि हमारी न्यायपालिका क्या बिल्कुल संवेदनहीन है....जिसके लिए पच्चीस हजार से ज्यादा लोगों की जिंदगियां किसी काम की नहीं......और जब इतना कमजोर फैसला सुनाया जाएगा और दोषी बड़ी कंपनियों के आला ओहदेदार होंगे तो जमानत उसी दिन मिलना भी लाजमी है........
हां...ये फैसला आने के बाद जो बातें खुलकर सामने आ रही हैं वो और भी दुखद हैं....पहली ये कि कंपनी समूह के अध्यक्ष वारेन एंडरसन को सरकारी मशीनरी ने भारत से भागने के लिए कॉरिडोर दी.....प्लेन मुहैया कराया ....जबरन जमानत दिलाई...और ये सब हुआ केंद्र और राज्य सरकार के बड़े ओहदों पर काबिज लोगों की वजह से....उनके इशारे पर....ताकि अमेरिका से हमारे रिश्ते मजबूत बने रहें....अगर किसी देश की सरकार अपने पच्चीस हजार लोगों की मौत के दोषी के सामने इतनी शालीनता से पेश आयेंगे तो जाहिर है विदेश से उनके रिश्ते मजबूत तो होंगे ही.....और देश के पच्चीस क्या पचास हजार लोगों की जिंदगियों का क्या...करोड़ों – अरबों की जनसंख्या का ये तो एक फीसदी भी नहीं......मरे तो अपनी बला से.....वोट की राजनीति चलती रहेगी.....एक-दो पीढ़ियां अपंग होती हैं..तो होने दो...उसके बाद की पीढ़ी तो ठीक हो जाएगी......ओबामा, क्लिंटन या फिर बुश से रिश्ते तो नहीं बिगड़ेंगे........ऐसे मौकों पर राहुल गांधी, सोनिया गांधी या फिर मनमोहन सिंह को पीसी करने की जरुरत भी नहीं दिखी...क्योंकि इन सारी करतूत में कांग्रेस नंगी हो चुकी है......गृह मंत्री ने जरुर एक समिति बनाने की घोषणा कर अपने नंगेपन को केले के पत्ते से ढंकने की कोशिश की.....लेकिन उन्हें नहीं पता कि हवा के एक झोंके में वे फिर नंगे हो जायेंगे..........

4 टिप्पणियाँ:

सब राजनीति है क्या करेंगे.

मरने वाले तब भी मासूम इन्सान ही होंगे..किसी के भाई, किसी के बेटे, बहनें माँ...

यह तो समस्या का हल नहीं.

निर्णय देनेवालों पर सीधे वार करिए .. समय का इंतज़ार क्यों ? खुलकर लिखिए

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