मुझे आज भी याद है ..जब मैंने खुद ये ठान लिया था...सोच लिया था कि.....जिंदगी जीने के लिए अगर ढंग की नौकरी नहीं मिली तो पत्रकारिता करुंगा .....शायद यही वजह है कि मैं आज पत्रकारिता में हूं....लेकिन कभी कभार जब सोचने बैठता हूं तो लगता है कि मेरा तब का ये फैसला आज के परिप्रक्ष्य में गलत निकला....आज की पत्रकारिता में एक पत्रकार ही दूसरे का शोषण करता है.....करना चाहता है...करते हुए देखता है...कुछ बोलता नहीं...मुक स्वीकृति देता रहता है...औक कभी कभी विरोध करने पर विरोध करने वाले को दंड भी देता है...ये अलग बात है कि ऐसा वो किसी मजबूरी में करता है....लेकिन तब वो ये भूल जाता है वो भी उसी बिरादरी का सदस्य है...उसी परिवार का हिस्सा है.....जिसे पत्रकार कहते हैं...आजादी के पहले की पत्रकारिता मैंने देखी नहीं,सुनी नहीं ...बस पढ़ा भर हूं...आजादी के बाद की पत्रकारिता भी मैंने सुनी और पढ़ी है....लेकिन अस्सी के दशक के बाद मैंने जो कुछ भी पत्रकारिता के बारे में सुना...पढ़ा....उसे महसूस कर उसे अपनी जिंदगी जीने का लक्ष्य बना लिया....इसके कई कारण हैं....कुछ हमने महसूस किए.....कुछ आपने किए होंगे.....मैंने जो महसूस किया...मैं बता रहा हूं....और चाहता हूं कि आप अपने एहसास को भी जरुर रखें....ताकि लोग समझें...जानें और सिर्फ प्रबुद्ध वर्ग में शामिल होने के लिए पत्रकारिता करने की गुस्ताख़ी न करें......
मैं मानता हूं कि आज का पत्रकार बड़े पैसेवालों की गुलामी कर रहा है....बंधुआ मजदूर बनकर काम करता है....शोषित है पर मुंह नहीं खोलता...इस डर से कि नौकरी चली गई...तो घर कैसे चलेगा...दो जून की रोटी कैसे नसीब होगी....क्योंकि इस पेशे को उसने खुद अपनी मर्जी से चुना है......बस्स इस फिराक़ में रहता है कि इससे बेहतर नौकरी मिल जाए जिससे फिर एक-दो साल मजे में गुजर जाए......
दुनिया जितनी देखी...जितनी सुनी.......जितनी महसूस की...उसके अनुसार पत्रकारिता के बड़े ओहदे पर बैठा पत्रकार ही अपने से छोटे पत्रकार चूसता है.....गाली देता है....शोषण करता है...और कभी कभी छोटी - बड़ी गलतियों को लेकर उसकी नौकरी भी छीन लेता है.......क्योंकि वो भी बाध्य होता है...किसी धन्ना सेठ के हाथों....मजबूर होता है...क्योंकि उसका भी घर परिवार है....उसने भी अपने दायरे बढ़ा रखे हैं...खर्चे बढ़ा रखे हैं ....ऐसा न करने पर उसका खुद का अस्तित्व संकट में होता है...और खुद का अस्तित्व बचाने के लिए वो दूसरों का अस्तित्व मिटा देता है.......आपने भी महसूस किया होगा.....कर रहे होंगे......ऐसा अक्सर होता है.....
पत्रकार बनने के लिए समाज की समस्याओं को समझना, उसे महसूस करना , उससे जुड़ाव का अनुभव करना जरुरी है.....जरुरी होता है....क्योंकि जबतक आप जुड़ेंगे नहीं तबतक आपकी लेखनी आगे नहीं बढ़ेगी.....समाज के दूसरे वर्गों के लोगों के शोषण पर संपादकीय लिखना,विश्लेषण करना सहज भी है और सरल भी.....लेकिन अपने लोगों का शोषण देखना उतना ही कष्टकर है दुखदायी होता है.....लेकिन आज के दौर में हर पत्रकार इसे भी सहता है.....झेलता है....ये अलग बात है कि अब पत्रकारों के दो वर्ग हो गए हैं...एक वो जिनकी आमदनी लाखों में या लाख के करीब है......और दूसरे वो जो आज भी हजारों रुपया कमाने के लिए बरसात में आंधी पानी,गर्मी में लू के थपेड़े और जाड़े में हाड़ कंपा देने वाली ठंढी हवाओं को झेलते हैं.....इस मकसद के साथ नहीं कि उनका काम समाज के लिए काफी महत्वपूर्ण है बल्कि इस मकसद के साथ कि नहीं किया तो ऊपर बैठे लोग उनकी बाट लगा देंगे........उनकी नौकरी ख़तरे में पड़ जाएगी.......और फिर परिवार कैसे चलेगा........
अब पत्रकारिता आंदोलन नहीं.....पत्रकारिता मिशन नहीं......दूसरे हर प्रोफेशन की तरह एक व्यवसाय बन चुका है...पूरी तरह...कुछ लोग भले ही न मानें लेकिन ये कटू सत्य है.....सामाजिक जिम्मेदारी भूल चुका मीडिया का मकसद अब सिर्फ कमाई है.....कैसे भी.....हर कोई यही कर रहा है....क्या प्रिंट ...क्या इलेक्ट्रॉनिक....अब तो खबरें बिकती हैं......खबरें पैसे देने पर चलती हैं.......ख़बरें विज्ञापनदाताओं के खिलाफ होने पर नहीं चलतीं..........क्योंकि सबको पैसा चाहिए......ताकि बड़ी बड़ी मशीनें खरीदी जा सकें......बड़े बड़े प्रिंट ऑर्डर के लिए.......और जिसने पैसा लगाया है वो भी तो कमाने के लिए अपनी करोड़ों की संपत्ति लगा रखी है......यानी अब पत्रकारिता माने ख़बरों की फैक्ट्री.....जहां कच्ची खबरें पॉलिश की जाती हैं.....उनकी लेबलिंग और पैकेजिंग की जाती है......
यानी अब पत्रकारिता के मकसद बदल चुके हैं.....हर जगह पैसा घुस चुका है...गलत भी नहीं है.....आंदोलन से फैक्ट्री नहीं चलती ......पत्रकारिता की फैक्ट्री भी नहीं.....कमाना होगा तभी मजदूरों का भुगतान होगा...कमाई नहीं तो भुगतान ...पेमेन्ट की बात सोचना भी बेमानी है....सोचने की हिमाकत करना .....चलो अच्छा है सोच लिया..... आगे से मत सोचना.........क्योंकि जब अख़बार बिकता है.....तब पत्रकार क्यों नहीं...संपादक क्यों नहीं.....समाज में हो रहे बदलाव से वो अगल कैसे रहेगा........ये तो रहे मेरे शब्द....उम्मीद करता हूं ...आप अपने शब्द प्रतिक्रिया में सहेजेंगे......
Mohalla Live
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Mohalla Live
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गाली-मुक्त सिनेमा में आ पाएगा पूरा समाज?
Posted: 24 Jan 2015 12:35 AM PST
सिनेमा समाज की कहानी कहता है और...
10 वर्ष पहले
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