फिर लगेगा नाइट कर्फ्यू
मगर उनका क्या 
जो रात में ठेले लगाते हैं
खोमचों में बेचते हैं सपने
अपने बच्चों के
जो बुनते हैं ख्वाब
दिन के उजाले में
खर्राटों के बीच

उनका भी क्या
जिन्हें रात में
मटरगश्ती की  
आदत है..खानदानी..पुरानी
जिस शहर में 
रात की रौनक होगी
बदल देंगे शहर

सोचता कौन है
रात तो रात होती है
गरीबों की 
फुटपाथ पर
अमीरों की..सड़कों पर
या किसी होटल में
पब में...बार में
या फिर ....आगोश में


गलतियां इन्सान की, बेवजह नहर बदनाम हो गई
देखते ही देखते, हादसा हुआ... वो श्मशान हो गई
गलतियां इन्सान की, बेवजह नहर बदनाम हो गई
वो तो बस थी, रोज मंजिल तक पहुंचना काम था
वक्त ने करवट क्या बदली, मौत का सामान हो गई
गलतियां इन्सान की, बेवजह नहर बदनाम हो गई
टूट गए रिश्तों के डोर, दम निकले अरमानों के
जिंदगी की कोशिशें, मौत के सामने नाकाम हो गई
गलतियां इन्सान की, बेवजह नहर बदनाम हो गई
अपनों ने सपनों को खोया, बूढ़ा बाप भी कितना रोया
ढूंढते अपनों की लाशें, सुबह से शाम हो गई
गलतियां इन्सान की, बेवजह नहर बदनाम हो गई

कितना सरल है
बस संवेदना प्रकट करना
मुआवजों का ऐलान कर देना 
ये कह देना कि 
असीम दुख की इस घड़ी में
हम आपके साथ हैं
ईश्वर आपको शक्ति दे
इसे सहन करने की 
कितना सरल है
मगर सब जानते हैं
कोई कम नहीं कर सकता 
किसी का दुख
किसी का दर्द
मुआवजे खत्म हो जाते हैं
महज चंद दिनों में 
फिर जिंदगी भर 
टीसता रहता है
वो घड़ी, वो पल
फिर उलझ जाती है
जिंदगी की पगडंडियां
रास्ते दिखते नहीं
आंसूओं से डबडबाए आंखों से
मगर चलना भी है
क्योंकि नियति यही है
बीतते सालों में 
नश्तर की चुभन घटती है
जिंदगी चल पड़ती है 
नई मंजिलों की तलाश में

जिंदगी की हकीकत, कोई समझाए
कब तलक इतनी फजीहत, कोई समझाए

देने वाले तो मिल जाते हैं हर दिन हजार
किसकी उम्दा है नसीहत, कोई समझाए

खनक रिश्तों की, या कि टनक सिक्कों की
बेहतर कौन सी मिल्कियत, कोई समझाए

न‌ लेके कोई कुछ आया, न लेके जाएगा
कौन सी किसकी वसीयत, कोई समझाए

दुनियादारी तो सिखाते हैं कई लोग "क्षितिज"
खत्म क्यों हो रही इन्सानियत, कोई समझाए

कल की फिक्र न करना कोई, कल तो आनी जानी है
जो भी है, बस आज है, जी ले, कल की अलग कहानी है

बीत गया एक साल समूचा, बच गई सिर्फ निशानी है
अब तो आए नए साल से, रिश्ते नई निभानी है 
कल की फिक्र न करना कोई, कल तो आनी जानी है

उसके शिकवे, गिले किसी के, दिल पर लेकर क्या जीना
किसी के खातिर कुछ कर जाओ, दिल को ये समझानी है
कल की फिक्र न करना कोई, कल तो आनी जानी है

इक इक खुशियां, इक मुस्कानें, चलो पिरोएं धागों में
बीच बीच में, दर्द-ओ-ग़म, की कलियां कहीं सजानी है
कल की फिक्र न करना कोई, कल तो आनी जानी है

कभी मुश्किल...कभी आसान लगती है
ये जिंदगी, कड़ा इम्तहान लगती है

कभी तो बेरुख़ी ऐसी कि मत पूछिए
कभी तो ग़जब की मेहरबान लगती है

हमारी हसरतों की फेहरिस्त लंबी है जरा
तभी हर लम्हा, यूं हलकान लगती है

खुशियां..मुस्कुराकर गुजर जाती है अक्सर
कभी बेपरवाह, कभी बेजुबान लगती है

-क्षितिज

मुश्किलातों का समंदर, हौसले की कश्तियां
और जब गिरती हैं, यारों आसमां से बिजलियां

मैं समझ जाता हूं रोया, रात भर कोई बहुत
अश्क का कतरा न था, थीं तो केवल सिसकियां

मेरे सीने से भी गुजरे, दर्द - ओ - ग़म के रेल भी
जानता हूं, क्यों नहीं रुकती हैं आखिर हिचकियां

आपके उनके तजुर्बे, मेरे हैं किस काम के
मेरे दिल से कोई पूछे, जब उड़ी थीं गिल्लियां
-क्षितिज

हर रोज सबेरा होता है
कल की गलती से सीखो कुछ
जीवन फिर मौका देता है
हर रोज सबेरा होता है

कुछ लोग अलग ही होते हैं
हर रस्ते में, हर मोड़ पे वो
औरों को धोखा देता है
हर रोज सबेरा होता है

लेकिन हर दिल के राज अलग
रंग अलग, अंदाज अलग
कितनी भी मुश्किल आ जाए
दिल...दिल को समझा देता है
हर रोज सबेरा होता है

हर बात अलग, जज्बात अलग
मुश्किल घड़ियां, हालात अलग
पर, खुशियों के पल हौले से
जख्मों को सहला देता है
हर रोज सबेरा होता है
-क्षितिज

नौकरशाही पर नकेल
सियासत का खेल
हर तरफ रेलमपेल
क्या करेंगे ?
बातें बदलाव की
काम करेंगे घाव की
कीमत हर दांव की
क्या करेंगे
होठों पर मीठी मुस्कान
दिल नहीं, खाली दुकान
रिश्ते भी हो गए सामान
क्या करेंगे
नहीं किसी की फिक्र
बस बात बात में जिक्र
लगाएंगे सभी के चित्र
क्या करेंगे
रिश्ते रिसने लगे
बुड्ढे भी सीखने लगे
घुन संग गेहूं पिसने लगे
क्या करेंगे
अब नहीं किसी के पास वक्त
हट्टा कट्टा हो या निःशक्त
सब अपने आप में मस्त
क्या करेंगे


न पूछो हाल मेरे शहर का अभी मुझसे बड़ी वीरानियां है सन्नाटों में दस्तक का होता है धोखा बड़ी निगरानियां है हर शख्स घर के कमरों में ही है सोता न पूछो हाल मेरे शहर का अभी मुझसे किसी को देखकर पहचानना आसां नहीं अब कि हर चेहरा छुपा है... मास्क के पीछे अब तो कि जैसे हर किसी को टास्क मिला हो वैसे बड़ी परेशानियां है न पूछो हाल मेरे शहर का अभी मुझसे बड़ी वीरानियां है सड़क पर एक भी बच्चा, कहीं दिखता नहीं है सभी को वायरस की आहट से डर लगने लगा है न कोई आंख से आंखें मिलाकर बात करता जो मिलते दूर से, तो काट कर कन्नी गुजर जाते हैं अब तो बड़ी दुश्वारियां हैं न पूछो हाल मेरे शहर का अभी मुझसे बड़ी वीरानियां है जमाने से सुनी न खिलखिलाहटें किसी की किसी चेहरे पर मिलती नहीं मुस्कान अब तो सभी को फिक्र अब होने लगी है ..क्या होगा आगे न पूछो हाल मेरे शहर का अभी मुझसे बड़ी वीरानियां है सियासतदां ने तो कोशिश बहुत की.... मगर नादान अपने दोस्त ही हैं समझते ही नहीं, हालात की दुश्वारियों को बड़ी नादानियां हैं न पूछो हाल मेरे शहर का अभी मुझसे मगर...मानो मेरी...उम्मीद का दामन न छोड़ो मुझे मालुम है...सूरज उगेगा...छंटेगा ये अंधेरा मरेगा.... वायरस का ये राक्षस भी जल्दी दूर हो जाएगा, सड़कों का सूनापन लौटेगी हर शहर की रौनकें जल्दी मगर... न पूछो हाल मेरे शहर का अभी मुझसे


बस में काफी भीड़ थी...अपने पैरों पर खड़ा होना भी मुश्किल लग रहा था....कोई सीट खाली होती तो लोग उस पर बैठने के लिए आपाधापी करने लगते...तभी एक सीट खाली हुई....एक बुजुर्ग ..जो सीट के करीब खड़े थे...ने आवाज लगाई...बहन जी आप बैठ जाओ ...आपको दिक्कत हो रही है....आ जाओ...जल्दी.....महिला भी लपककर आई..और सीट पर बैठ गई....अगले स्टॉप पर भी एक सज्जन उतरे....बुजुर्ग व्यक्ति ने वहां भी खुद बैठना मुनासिब नहीं समझा और एक दूसरी महिला को सीट पर बैठने के लिए जगह छोड़ दिया......थोड़ी देर बाद आए एक स्टॉप पर एक साहब सीट छोड़कर नीचे उतरने लगे...बुजुर्ग व्यक्ति को लगभग धकियाकर एक युवक आगे बढ़ने की कोशिश करने लगा....उस वृद्ध व्यक्ति ने उसे समझाया....तुम्हारी उम्र ही क्या है...तुम तो खड़े रह सकते हो...जवान हो....मुझे बैठने दो....दस बारह किलोमीटर का और सफर है.....अरे बाबा...मैं आपकी तरह परोपकारी नहीं...परोपकारी बनूंगा तो रोज खड़े ही सफर करना पड़ेगा....और आगे बढ़कर वो युवक धम्म से सीट पर विराजमान हो गया.....बुजुर्गवार ने कुछ नहीं कहा....सोचने लगे...ये अंतर शायद पीढ़ी का है.....और कुछ संस्कार का भी.....

आईसीसी यानी क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष माननीय शरद पवार साहब लगता है जनता के नुमाइंदे कहलाते तो हैं लेकिन हैं नहीं...अगर होते तो अपने मंत्रालय से संबंधित विभागों पर नियंत्रण रखते...लेकिन जनाब तो ये तो अपने मंत्रालय से भी खेलते हैं...कभी बैटिंग करते हैं तो कभी बॉलिंग...और इन्हें ऐसा गुमान है कि ये हर बार जीतते हैं...और हार जाती है जनता बेचारी....और तो और जनाब इनकी जुबान भी काली है....जिस जिस चीज का नाम इनकी जुबान पर आता है ...कीमतें सीधी उपर चढ़ने लगती हैं....अब इन्हें कौन समझाए...इतने बड़े ओहदे पर बैठा आदमी ...भला आम आदमी के उपयोग की चीजों का नाम कभी लेता है भला.....मैंने तो कभी किसी मंत्री को अपने विभाग से संबंधित चीज का नाम लेते नहीं सुना....लेने की जरूरत ही क्या है....वो चीज तो उनके घर की हो जाती है....और जो चीज घर की उसका नाम क्या लेना....जब सोचा हाजिर........नाम लेना हो तो उनके सेक्रेटरी-पी ए लें उस चीज का नाम...लेकिन साहब इन्हें तो अपने मंत्रालय की हर उस चीज का नाम पता है ...जिसमें इनके नाम लेने मात्र से लग जाती है आग...आग भी ऐसी जिससे निकलती है उंची उंची लपटें...और आम आदमी उसमें झुलस जाता है......अब भला इतने बड़े ओहदेदार...सीनियर मंत्री के बारे में कोई क्या कहे....इतने बड़े मंत्री हैं कि कभी पीएम बनने का ख्वाब देखते थे....ये अलग बात है कि अब वो क्रिकेट का पीएम बन चुके हैं.....कभी गेहूं की किल्लत की बात कही....तो गेहूं के दाम बढ़ गए...कभी चीनी का नाम लिया...तो चीनी को चढ़ गई.....अब ये अलग बात है एफसीआई के गोदामों में या गोदाम के बाहर करोड़ों रुपए का अनाज सड़ जाता है ...अब इसमें इनकी क्या गलती...जनाब अनाज है तो सड़ेगा ही.....इतने बड़े देश में थोड़ा बहुत अनाज सड़ गया तो मंत्री जी क्या करें....और क्या इतना बड़ा मंत्री हर गोदाम और रेलवे स्टेशनों पर पड़े गेहूं की देखभाल करता रहेगा.....सवाल ही नहीं है...मंत्री हैं कोई संतरी थोड़े न हैं कि देखते रहें...देखने का काम करें.....संतरी....अब इन टीवी वालों की इसकी समझ ही नहीं ..वो तो चाहते हैं मंत्री जी दिन रात गोदामों में और गोदामों के बाहर पड़े अनाजों की रखवाली करें...जो संभव ही नहीं....अब टीवी वालों को तो मसाला चाहिए दिखाने का...मिल गया तो इतने बड़े मंत्री जी को लपेट लिया.....हल्ला मचाने लगे कि करोड़ों का अनाज सड़ गया.....टीवी वाले हर चीज को पर्सनल बना लेते हैं.....करोड़ों का अनाज न हुआ क्या हो गया.....सरकार की हर बात करोड़ों से शुरू होती है तो अनाज भी तो करोड़ों का ही सड़ेगा न...... सच पूछिए जनाब तो मुझे पवार साहब से कोई शिकायत नहीं....अब इतने बड़े मंत्री हैं तो अपनी पावर नहीं दिखाऐंगे क्या......चुनाव लड़ना होता है...चुनाव में करोड़ों खर्च होते हैं...कौन देगा....ये टीवी वाले......अब तो इनका ओहदा भी बढ़ गया है....इन्टरनेशनल क्रिकेट काउंसिल यानी आईसीसी के ये बन गए हैं अध्यक्ष.....और कभी कभी तो लगता है जैसे टीवी वाले कुछ खास मंत्रियों के जानी दुश्मन हैं.....इनमें एक हैं अपने पवार साहब...पीएम से मिले तो खबर....न मिलें तो खबर....पीएम से मिले तो हल्ला मच गया कि पवार साहब विभाग कम कराने के लिए मिले हैं प्रधानमंत्री साहब से....भला कोई अपना मंत्रालय कम कराना चाहेगा....वो भी इस कलियुग का कोई मंत्री....टीवी वालों का भी न....लगता है दिमाग फिर गया है...अनाप शनाप जो दिमाग में आता है दिखा देते हैं.....अपने पवार साहब तो ऐसे हैं कि जब चाहें...पीएम से दो चार विभाग और मांग लें....लेकिन ये बातें टीवी वालों को थोड़े न पता है.....मुझे पता है इसलिए कह रहा हूं........


आप जो भी अखबार उठा लें...हर तरफ यही लिखा है कि बिहार में पिछले एक सप्ताह में तीन बंद से बिहारवासी त्रस्त हो गए, बेहाल हो गए...लेकिन जनाब क्या कभी आपने सोचा है कि ये बंद कितना जरूरी है...नहीं सोचा होगा...अपने आप से आगे सोचने की फुर्सत मिले तब तो सोचेंगे आप......आप कमाने धमाने के लिए ऑफिस जाते हैं, दुकान खोलते हैं, रेहड़ी लगाते हैं, अखबार बेचते हैं, चैनल चलाते हैं, रिश्वत लेते हैं-देते हैं....और भी न जाने क्या कया करते धरते हैं...तो जनाब इसी तरह राजनीति पार्टियों की दुकान चलती है रैलियों से, विरोध प्रदर्शन से, हड़ताल से , बंद से, लट्ठम लठाई से.....यानी राजनीतिक पारक्टियों की दुकान चलती रहे...इसके लिए जरूरी है कि बंद-हड़ताल आदि होते रहें.....
अब ये कतई जरूरी नहीं कि सरकार अच्छा काम कर रही हो और विपक्ष बंद न करे...हड़ताल न करे....जनाब सरकार किसी की रहे...विकास की गंगा बहाने का दावा कर रहे नीतीश कुमार की या लगातार महंगाई बढ़ाने वाले मनमोहन सिंह की...या फिर दलितों का उत्थान करने का संकल्प लेने का दम भरने वाली मायावती की......विपक्ष तो अपना काम करता रहेगा....वजह साफ है चुनाव में उन्हें भी जनता को दिखाना है कि हम भी कुछ करते हैं...कर सकते हैं....करना चाहते हैं....अब ये अलग बात है कि वो कुछ करना चाहें या न करना चाहें.......यही वजह है कि एनडीए,वामपंथियों और दूसरे दलों ने मिलकर भारत बंद का आह्वान किया तो मायावती ने अकेले दम पर यूपी में महंगाई का विरोध कर सोनिया-मनमोहन को चुनौती देने की कोशिश की......अब ऐसे में आरजेडी के लालू और एलजेपी के रामविलास भला कहां पीछे रहने वाले थे...उन्होंने भी अपने बिहार में बंद का आयोजन कर महंगाई का विरोध किया वो भी अपने अंदाज में...लेकिन ये महंगाई के विरोध में कम था नीतीश सरकार को चुनौती देना ज्यादा लगा......लेकिन जैसा कि मैंने पहले भी कहा...राजनीति की दुकान चलाने के लिए ये भी जरूरी था.....जनता लाख चिल्लाए...मरे...अपनी बला से......रोजी-रोटी सबकी चलनी चाहिए.....बीजेपी की भई,जदयू की भी,आरजेडी की भी,लोजपा की भी,बसपा की भी...और कांग्रेस तो गोदाम पर कब्जा किए बैठी है...उसकी तो बात ही मत कीजिए..........


जब से गर्मी का महीना शुरू हुआ है तब से घरवालों से जब भी बात होती है तो रुह कांप जाती है...इस भयंकर गर्मी के मौसम में चार से पांच घंटे बिजली मिल पाती है....जिससे भी बात कीजिए ...बात घुम-फिरकर आ जाती है बिजली पर.....बड़ा बुरा हाल है बेटा बिजली रहती ही नहीं.....इन्वर्टर चार्ज तक नहीं हो पाता और इस भयंकर गर्मी में तो ऐसा लगता है जैसे नरक में पूर्व जन्मों के पापों की सजा भोग रहा हूं......ऐसी बातों से कोफ्त भी होती है, गुस्सा भी आता है..... लेकिन जब सोचने लगता हूं तो लगता है कोई भी सरकार करे तो क्या करे.....बिजली आपूर्ति करना कोई पियाऊ खोलने जैसा तो है नहीं.....लोगों को बिजली चोरी की आदत लगी है....बिजली खर्च करेंगे हजार का बिल जमा करेंगे सौ रुप्य्या...सरकार करे तो क्या करे.....और यही वजह है कि दम ठोंक कर बिहार में बिजली आपूर्ति के लिए कोई पार्टी.....कोई संगठन आगे नहीं आता.....सबको पता है कि बिहार में बिजली उत्पादन कितना होता है.....खरीदकर सरकार दान में बिजली सप्लाई करे तो क्यों करे.....लेकिन बिहार के लोग इस बात को समझने के लिए कतई तैयार नहीं...और जो समझना चाहते हैं उन्हें निरा बेवकूफ समझा जाता है....जबकि लोग ये भूल जाते हैं कि अगर बिजली आपूर्ति के मुताबिक बिल का भुगतान होने लगे तो सरकार को मिलने वाला राजस्व तो बढ़ेगा ही.....व्यापार और उद्योग-धंधे भी तेजी से प्रगति करेंगे.....गांव-देहात की नहीं जिला मुख्यालयों में चार से पांच घंटे बिजली आपूर्ति के कारण बिजली से चलने वाले उपकरण का व्यापार , इन्वर्टर का व्यापार, लघु, मध्यम तथा वृहत आकार के उद्योग धंधों की दुकानदारी बाबा आदम के जमाने की चल रही है.....लोग सोचने हैं एसी – कूलर क्यों खरीदें ...जब बिजली ही नहीं होगी..तो पैसा क्यों खर्च करें....जब अट्ठारह-उन्नीस घंटे बिना एसी-कूलर के रहेंगे...तो चार –पांच घंटे और सही.....अब जेनरेटर बाले लोग पांच फीसदी से ज्यादा तो हैं नहीं...लिहाजा व्यापार उद्योग के विकास का अंदाजा लगाना सरल है.....यानी बात वहीं ढाक के तीन पात.....
लेकिन इस मामले में सरकार भी कम दोषी नहीं.....सरकार कांग्रेस की रही हो.....लालू राबड़ी की हो या फिर नीतीश की.....हर राज्य बिजली आपूर्ति, वितरण और बिल भुगतान का काम निजी क्षेत्रों को सौंप रहा है.....और सरकार की एजेंसियां खुद मॉनिटरिंग कर रही है...लेकिन बिहार में बिजली चोरी की समस्या आज भी विकराल है....ये उपभोक्ताओं की नासमझी भी है और मूर्खता भी.....जो कम बिल का भुगतान कर.....बिजली ऑफिस के बाबू – इंजीनियर को कुछ रिश्वत देकर सोच लेते हैं कि बाजी मार ली.....जबकि हकीकत में बाजी उनके हाथ से निकलती जा रही है....और यही वजह है उनके घरों में आज बल्ब चौबीस घंटे में महज चार – पांच घंटे ही जल पाते हैं.....फ्रिज में हर वक्त ठंढा पानी नहीं होता....एसी-कूलर घर की शोभा के सामान बन जाते हैं......लेकिन इस बारे में उन्हें ही सोचना होगा.....कि वो सही तरीके से बिजली बिल का भुगतान करें....खुद भी चैन से रहें और औरों को भी रहने दें.....जाहिर से सरकार से हम सुविधाओं की मांग तभी प्रभावकारी तरीके से कर सकते हैं जब हम अपनी ओर से इमानदार हों........


वर्ल्ड कप का आगाज हो चुका है ...देश में फुटबॉल के दीवानों की कमी नहीं...मीडिया को हर दिन कई घंटे फुटबॉल की कहानी कहने का बहाना मिल चुका है.....अखबारों में कई पन्नों में छपने लगी वर्ल्ड कप की खबरें......ये अलग बात है कि एक अरब से ज्यादा जनसंख्या वाले इस देश में बारह चौदह अव्वल दर्जे के फुटबॉल खिलाड़ी पैदा करने का माद्दा नहीं.....करोड़ों – अरबों रुपये नेताओं की चाटूकारिता और उनके ऐशो-आराम पर खर्च करने वाले इस देश में खिलाड़ियों को मांजने ...उन्हें तैयार करने के लिए पर्याप्त रुपये नहीं निकलते...और जो निकलते हैं उनका सही खर्च नहीं होता.....हमें विदेशी खिलाड़ियों की चर्चा तक ही सीमित रहना पड़ता है.....ये अलग बात है कि फुटबॉल दूर दराज के देहात से लेकर शहर तक खेला और देखा जाता है.....लेकिन क्रिकेट की तरह इसके लिए हमारे पास अच्छे विश्वस्तरीय खिलाड़ी नहीं......ये हमारे लिए शर्म नहीं तो और क्या है......छोटी-छोटी जनसंख्या वाले छोटे छोटे देश वर्ल्ड कप जीतने की बात करते हैं और हमें उसमें जगह बनाने के लिए ...या यूं कहें तो क्वालिफाइंग मैच खेलने के लिए करनी पड़ती है कड़ी मशक्कत...... जाहिर है हमारे पास नहीं है कोई पुख्ता खेल नीति.....खेल के लिए हमारी सारी नीतियां क्रिकेट तक ही सीमित हैं......


भोपाल गैस कांड पर फैसला आने के बाद तत्कालीन कलक्टर और एसपी को सच बोलना महंगा पड़ सकता है....क्योंकि ये देश तो है नेताओं का....खबर ये है कि वारेन एंडरसन को भगाने के आरोप में दोनों अधिकारियों पर मामला दर्ज करने के लिए याचिका दर्ज की गई है...जिसकी सुनवाई दो जुलाई को होगी....एक बार फिर ये साफ हो गया कि इन सबके पीछे हो रही है सिर्फ और सिर्फ राजनीति....किसी ने तत्कालीन सरकारों और उन सरकारों के तत्कालीन तथाकथित मुखिया के खिलाफ याचिका दर्ज कराने की हिम्मत नहीं दिखाई....जाहिर है याचिका दर्ज कराने वाले लोगों में वो लोग शामिल हो सकते हैं ...जिन पर आरोपों की बौछार हो रही है......वैसे भी एक –दो अपवादों को छोड़ दें तो आजतक किसी आरोपी राजनीतिज्ञ पर आरोप तय ही नहीं होता....और जब आरोप ही तय नहीं होगा...तो सजा तो मिलने से रही......ये अलग बात है कि इसकी एक सबसे बड़ी वजह इन तथाकथित राजनीतिज्ञों का मौखिक आदेश होता है ...जिससे वो जब चाहें....जहां चाहें मुकर सकते हैं.......और उपर से नीचे...यानी निम्न से उच्च और यहां तक कि उच्चतर न्यायपालिका भी राजनीति के गहरे गिरफ्त में है....आजाद होने का महज ढोंग किया जाता है......जनता को ...व्यवस्था को बेवकूफ बनाने के लिए......बात अर्जुन सिंह की हो......या फिर तत्कालीन केंद्र सरकार के मुखिया की...सभी अमेरिका परस्त थे....आज भी हैं.....और ऐसे में आज भी वो वारेन एंडरसन के प्रत्यर्पण पर कोई गंभीर कदम उठायेंगे.....ऐसा सोचना भी मूर्खता होगी.....आज की सरकार को एंडरसन को सजा दिलाने की न तो मंशा है.....और न ही उसने इस बारे में खुलकर कुछ कहने की जहमत उठाई है.......और जिन्होंने सच कहने की हिम्मत दिखाई उनके खिलाफ याचिका दर्ज कर उन्हें चुप कराने की साजिश जरुर रची जा रही है......ये है राजनीति की सच या यूं कहें तो सच में राजनीति........


करीब पच्चीस साल बाद भोपाल के यूनियन कारबाईड कंपनी से गैस रिसाव की बड़ी घटना के लिए दोषी लोगों को सुनाया गया सिर्फ दो साल की अधिकतम सजा...ऐसी सजा जो गैर जिम्मेदार तरीके से सड़क पर वाहन चलाने वालों को दी जाती है.....इसके लिए हम अपने न्यायपालिका को दोष दें या फिर सरकारी मशीनरी की....जिसके लिए पच्चीस हजार लोगों की जिंदगी कोई मायने नहीं रखती.....एक पीढ़ी के मानसिक और शारीरिक रुप से विकलांग होने की स्थिति शायद उतनी गंभीर नहीं है....फैसले का टीवी चैनलों और मीडिया माध्यमों को जितना बेसब्री से इंतजार था उससे ज्यादा बेकरार थे गैस पीड़ित....और उनके परिजन, जिन्हें वारेन एंडरसन, केशव महिन्द्रा समेत सभी आरोपी किसी दरिंदे से कम नहीं दिख रहे थे.....उनकी आंखें कड़ी से कड़ी सजा सुनने के लिए आतुर थीं....लेकिन जब जज साहब ने फैसला सुनाया तो एकबारगी उनके पैरों तले की जमीन खिसक गई.....मीडिया को बहस का मौका मिल गया लेकिन गैस पीड़ितों और उनके परिजनों के दिलों पर सांप लोटने लगा.....उन्हें लगा मानो न्यायपालिका ने उनकी बेबसी, उनके दुख दर्द का भद्दा मजाक उड़ाया है......तभी तो कानून मंत्री तक को ये कहने पर मजबूर होना पड़ा कि फैसले में न्याय दफन हो गया है.......सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस जो भी कहें लेकिन हकीकत तो यही है कि भोपाल गैस कांड के फैसले ने ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि हमारी न्यायपालिका क्या बिल्कुल संवेदनहीन है....जिसके लिए पच्चीस हजार से ज्यादा लोगों की जिंदगियां किसी काम की नहीं......और जब इतना कमजोर फैसला सुनाया जाएगा और दोषी बड़ी कंपनियों के आला ओहदेदार होंगे तो जमानत उसी दिन मिलना भी लाजमी है........
हां...ये फैसला आने के बाद जो बातें खुलकर सामने आ रही हैं वो और भी दुखद हैं....पहली ये कि कंपनी समूह के अध्यक्ष वारेन एंडरसन को सरकारी मशीनरी ने भारत से भागने के लिए कॉरिडोर दी.....प्लेन मुहैया कराया ....जबरन जमानत दिलाई...और ये सब हुआ केंद्र और राज्य सरकार के बड़े ओहदों पर काबिज लोगों की वजह से....उनके इशारे पर....ताकि अमेरिका से हमारे रिश्ते मजबूत बने रहें....अगर किसी देश की सरकार अपने पच्चीस हजार लोगों की मौत के दोषी के सामने इतनी शालीनता से पेश आयेंगे तो जाहिर है विदेश से उनके रिश्ते मजबूत तो होंगे ही.....और देश के पच्चीस क्या पचास हजार लोगों की जिंदगियों का क्या...करोड़ों – अरबों की जनसंख्या का ये तो एक फीसदी भी नहीं......मरे तो अपनी बला से.....वोट की राजनीति चलती रहेगी.....एक-दो पीढ़ियां अपंग होती हैं..तो होने दो...उसके बाद की पीढ़ी तो ठीक हो जाएगी......ओबामा, क्लिंटन या फिर बुश से रिश्ते तो नहीं बिगड़ेंगे........ऐसे मौकों पर राहुल गांधी, सोनिया गांधी या फिर मनमोहन सिंह को पीसी करने की जरुरत भी नहीं दिखी...क्योंकि इन सारी करतूत में कांग्रेस नंगी हो चुकी है......गृह मंत्री ने जरुर एक समिति बनाने की घोषणा कर अपने नंगेपन को केले के पत्ते से ढंकने की कोशिश की.....लेकिन उन्हें नहीं पता कि हवा के एक झोंके में वे फिर नंगे हो जायेंगे..........




मेडिकल काउंसिल अध्यक्ष के घर से मिले 1800 करोड़ से ज्यादा का सोना.....इसे हाल ही में सीबीआई ने रिश्वत लेते गिरफ्तार किया था...सीबीआई ने रिश्वत लेते गिरफ्तार किए एमसीआई अध्यक्ष डॉ. केतन देसाई के अहमदाबाद, दिल्ली और पंजाब स्थित घर पर छापेमारी की। देसाई व उनके सहयोगियों के घरों पर छापेमारी के बाद वहां से ढेरों अहम दस्तावेज जब्त किए गए,जिसे जांच एजेंसी ने स्क्रूटनी के लिए भेज दिया है.....सीबीआई अभी केवल दस्तावेजों की प्रामाणिकता और देसाई के काली कमाई के बारे में छानबीन कर रही है। सीबीआई अब यह भी पता करने की कोशिश कर रही है कि देसाई और परिवार के सदस्यों के नाम से कितनी संपत्ति है.....ये सब संभव इसलिए हो पाया क्योंकि केतन देसाई की राजनीतिक जड़े गहरी नहीं थीं...अगर गहरी होती तो अव्वल छापेमारी नहीं होती.....जनाब रिश्वत लेते पकड़े ही नहीं जाते.....इसलिए अगर आप रिश्वत लेते हैं तो राजनीति में पैठ बनाईए......खासकर सत्ताधारी नेताओं में...खाईए और खिलाईए....आपकी बाल भी बांका नहीं होगा......ललित मोदी भी राजनीति से पंगा लेने में गए...और भी कई नमूने मिल जायेंगे....जिसने राजनीति से पंगा लिया.....उसकी जड़े खुद गई.....पद भी गया.....और छापेमारी भी हुई....लेकिन जिसकी राजनीति में गहरी जड़े होती है....या जो खुद राजनीति में होता है....उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता.....चारा घोटाले में लालू का क्या हुआ.....निर्दलीय विधायक से मुख्यमंत्री बने मधु कोड़ा को ही लीजिए...अब तो चर्चा भी नहीं होती...और फिर धीरे धीरे सबकुछ फिट हो जाएगा.......राजनीतिज्ञों के लिए तो लगता है सौ खून माफ है....जो चाहो करो...सबका लाईसेंस मिल जाता है सिर्फ राजनीति करने से......इसलिए अगर आप भी कोई गलत काम करते हैं.....रिश्वत लेते हैं......आय के श्रोत से अधिक की संपत्ति अर्जित कर लिया है...तो आपके पास बस एक ही रास्ता है.....राजनीति को अपने करीब ले आईए....या उसी में समा जाईये...मजाल है कोई छू भी ले.....सब राजनीति के दास हैं.....और जब आप राजनीति के पास हो जायेंगे तो वो भी आपका दास हो जाएगा.............



अखबार में प्रधानमंत्री का एक बयान पढ़ा...देश की सबसे बड़ी समस्या हैं नक्सली...गलत... सरासर गलत......पीएम भी झूठ बोलते हैं...इतने बड़े ओहदे पर बैठा शख्स भी सच बोलने से डरता है या फिर जानबूझकर सच नहीं बोलना चाहता......देश की सबसे बड़ी समस्या तो है राजनीति......सड़ी-गली गंदी राजनीति......जिसमें इतनी गंदगी है कि उसे साफ करने के लिए सभी राजनेताओं को लेना पड़ेगा संन्यास.....या फिर निकाल फेंकना पड़ेगा राजनीति से.....क्योंकि एक भी रहे तो फिर गंदगी बढ़ती ही जाएगी......कहीं भी मामला करप्शन का हो...नेताओं का नाम जरुर आता है ...बात चाहे चारा घोटाले की हो.....बोफोर्स घोटाले की या फिर ताजा आईपीएल घोटाले की....हर घोटाले की जड़ राजनीति की दलदली जमीन में ही नजर आती है......ये अलग बात है कि आजतक किसी बड़े नेता को न तो सजा हुई...और अगर यही हाल रहा तो आगे भी नहीं होगी......और पीएम हों या सीएम.....राजनीति को दोष क्यों दें भला...उनकी दुकानदारी तो उसी से चल रही है.......इसलिए पीएम साहब ...देश में नक्सली कोई समस्या नहीं है....समस्या की जड़ को पहचानिए...जनता बेवकूफ नहीं ...काफी समझदार है............नक्सली समस्या की जड़ में भी यही गंदी राजनीति है......एक कहता है कार्रवाई करो...दूसरा कहता है नहीं करो.....एक उसका विरोध करता है ...दूसरा समर्थन.....एक चुनाव में उनकी सहायता लेता है ....उन्हें रुपए भिजवाता है...तो कई रात के घुप्प अंधेरे में जाकर मिलते हैं....कि भईया साथ देना.....तुम्हारा साथ जरुरी है....लेकिन दिन के उजाले में बात करेंगे नक्सल और नक्सली के विरोध की........ऐसे दूर होगी देश से नक्सली समस्या......जैसे राजनेताओं ने गरीबी हटाई....उसी तरह अब भी हटायेंगे नक्सी समस्या को........


भारत भी गजब का देश है...जहां एक ही दिन कहीं कोई नेतागिरी नहीं करने का उपदेश देता है तो कहीं मिल जाता है सेना में स्थायी रूप से काम करने का मौका...लंबे समय से महिलाओं को पैर की जूती, अबला तेरी यही कहानी .... और न जाने क्या क्या कहने वाला पुरुष प्रधान समाज अपने बराबरी में खड़ा होने देने से मना कर रहा है...मेरा मतलब सभी पुरुषों से नहीं बल्कि उन पुरुषों से है जिन्हें शायद अपने आप पर कम यकीन है....कि वो महिलाओं को आरक्षण मिलने के बाद कहीं हाशिए पर न आ जाएं....नेता तो नेता....अब धर्म-कर्म करने वाले तथाकथित धर्मगुरू ये उपदेश देने लगे कि महिलाओं को अच्छे नेता पैदा करने चाहिए न कि खुद नेतागिरी करनी चाहिए....उन्हें शायद इतना भी नहीं मालुम कि राजनीति किसे करनी चाहिए और किसे नहीं ये बताना भी धर्मगुरूओं का काम तो नहीं.....रही बात महिलाओं के राजनीति करने की....तो कुछ कहने से पहले ईतिहास पढ़ लें...देश-दुनिया को समझ लें तो बेहतर हो....कूपमंडूक बनकर सिर्फ उपदेश देना हास्यास्पद होता है.....बेगम खालिदा जिया,मरहुम बेनजीर भुट्टो, इंदिरा गांधी को अगर वो भूल गए हों तो ऐसे भलक्कड़ धर्मगुरूओं को क्या कहना....और फिर उनकी बातों को तवज्जो क्या देना.....इस कान से सुनिए...उस कान से निकाल दीजिए.....क्योंकि ये धर्मगुरु कतई नहीं...ये धर्म की आड़ में राजनीति करते हैं....और उन्हें ये खतरा भी लगने लगा है कि कहीं महिलाओं के आ जाने से उनकी दुकानदारी भी न फीकी पड़ जाय......