मेडिकल काउंसिल अध्यक्ष के घर से मिले 1800 करोड़ से ज्यादा का सोना.....इसे हाल ही में सीबीआई ने रिश्वत लेते गिरफ्तार किया था...सीबीआई ने रिश्वत लेते गिरफ्तार किए एमसीआई अध्यक्ष डॉ. केतन देसाई के अहमदाबाद, दिल्ली और पंजाब स्थित घर पर छापेमारी की। देसाई व उनके सहयोगियों के घरों पर छापेमारी के बाद वहां से ढेरों अहम दस्तावेज जब्त किए गए,जिसे जांच एजेंसी ने स्क्रूटनी के लिए भेज दिया है.....सीबीआई अभी केवल दस्तावेजों की प्रामाणिकता और देसाई के काली कमाई के बारे में छानबीन कर रही है। सीबीआई अब यह भी पता करने की कोशिश कर रही है कि देसाई और परिवार के सदस्यों के नाम से कितनी संपत्ति है.....ये सब संभव इसलिए हो पाया क्योंकि केतन देसाई की राजनीतिक जड़े गहरी नहीं थीं...अगर गहरी होती तो अव्वल छापेमारी नहीं होती.....जनाब रिश्वत लेते पकड़े ही नहीं जाते.....इसलिए अगर आप रिश्वत लेते हैं तो राजनीति में पैठ बनाईए......खासकर सत्ताधारी नेताओं में...खाईए और खिलाईए....आपकी बाल भी बांका नहीं होगा......ललित मोदी भी राजनीति से पंगा लेने में गए...और भी कई नमूने मिल जायेंगे....जिसने राजनीति से पंगा लिया.....उसकी जड़े खुद गई.....पद भी गया.....और छापेमारी भी हुई....लेकिन जिसकी राजनीति में गहरी जड़े होती है....या जो खुद राजनीति में होता है....उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता.....चारा घोटाले में लालू का क्या हुआ.....निर्दलीय विधायक से मुख्यमंत्री बने मधु कोड़ा को ही लीजिए...अब तो चर्चा भी नहीं होती...और फिर धीरे धीरे सबकुछ फिट हो जाएगा.......राजनीतिज्ञों के लिए तो लगता है सौ खून माफ है....जो चाहो करो...सबका लाईसेंस मिल जाता है सिर्फ राजनीति करने से......इसलिए अगर आप भी कोई गलत काम करते हैं.....रिश्वत लेते हैं......आय के श्रोत से अधिक की संपत्ति अर्जित कर लिया है...तो आपके पास बस एक ही रास्ता है.....राजनीति को अपने करीब ले आईए....या उसी में समा जाईये...मजाल है कोई छू भी ले.....सब राजनीति के दास हैं.....और जब आप राजनीति के पास हो जायेंगे तो वो भी आपका दास हो जाएगा.............



अखबार में प्रधानमंत्री का एक बयान पढ़ा...देश की सबसे बड़ी समस्या हैं नक्सली...गलत... सरासर गलत......पीएम भी झूठ बोलते हैं...इतने बड़े ओहदे पर बैठा शख्स भी सच बोलने से डरता है या फिर जानबूझकर सच नहीं बोलना चाहता......देश की सबसे बड़ी समस्या तो है राजनीति......सड़ी-गली गंदी राजनीति......जिसमें इतनी गंदगी है कि उसे साफ करने के लिए सभी राजनेताओं को लेना पड़ेगा संन्यास.....या फिर निकाल फेंकना पड़ेगा राजनीति से.....क्योंकि एक भी रहे तो फिर गंदगी बढ़ती ही जाएगी......कहीं भी मामला करप्शन का हो...नेताओं का नाम जरुर आता है ...बात चाहे चारा घोटाले की हो.....बोफोर्स घोटाले की या फिर ताजा आईपीएल घोटाले की....हर घोटाले की जड़ राजनीति की दलदली जमीन में ही नजर आती है......ये अलग बात है कि आजतक किसी बड़े नेता को न तो सजा हुई...और अगर यही हाल रहा तो आगे भी नहीं होगी......और पीएम हों या सीएम.....राजनीति को दोष क्यों दें भला...उनकी दुकानदारी तो उसी से चल रही है.......इसलिए पीएम साहब ...देश में नक्सली कोई समस्या नहीं है....समस्या की जड़ को पहचानिए...जनता बेवकूफ नहीं ...काफी समझदार है............नक्सली समस्या की जड़ में भी यही गंदी राजनीति है......एक कहता है कार्रवाई करो...दूसरा कहता है नहीं करो.....एक उसका विरोध करता है ...दूसरा समर्थन.....एक चुनाव में उनकी सहायता लेता है ....उन्हें रुपए भिजवाता है...तो कई रात के घुप्प अंधेरे में जाकर मिलते हैं....कि भईया साथ देना.....तुम्हारा साथ जरुरी है....लेकिन दिन के उजाले में बात करेंगे नक्सल और नक्सली के विरोध की........ऐसे दूर होगी देश से नक्सली समस्या......जैसे राजनेताओं ने गरीबी हटाई....उसी तरह अब भी हटायेंगे नक्सी समस्या को........


भारत भी गजब का देश है...जहां एक ही दिन कहीं कोई नेतागिरी नहीं करने का उपदेश देता है तो कहीं मिल जाता है सेना में स्थायी रूप से काम करने का मौका...लंबे समय से महिलाओं को पैर की जूती, अबला तेरी यही कहानी .... और न जाने क्या क्या कहने वाला पुरुष प्रधान समाज अपने बराबरी में खड़ा होने देने से मना कर रहा है...मेरा मतलब सभी पुरुषों से नहीं बल्कि उन पुरुषों से है जिन्हें शायद अपने आप पर कम यकीन है....कि वो महिलाओं को आरक्षण मिलने के बाद कहीं हाशिए पर न आ जाएं....नेता तो नेता....अब धर्म-कर्म करने वाले तथाकथित धर्मगुरू ये उपदेश देने लगे कि महिलाओं को अच्छे नेता पैदा करने चाहिए न कि खुद नेतागिरी करनी चाहिए....उन्हें शायद इतना भी नहीं मालुम कि राजनीति किसे करनी चाहिए और किसे नहीं ये बताना भी धर्मगुरूओं का काम तो नहीं.....रही बात महिलाओं के राजनीति करने की....तो कुछ कहने से पहले ईतिहास पढ़ लें...देश-दुनिया को समझ लें तो बेहतर हो....कूपमंडूक बनकर सिर्फ उपदेश देना हास्यास्पद होता है.....बेगम खालिदा जिया,मरहुम बेनजीर भुट्टो, इंदिरा गांधी को अगर वो भूल गए हों तो ऐसे भलक्कड़ धर्मगुरूओं को क्या कहना....और फिर उनकी बातों को तवज्जो क्या देना.....इस कान से सुनिए...उस कान से निकाल दीजिए.....क्योंकि ये धर्मगुरु कतई नहीं...ये धर्म की आड़ में राजनीति करते हैं....और उन्हें ये खतरा भी लगने लगा है कि कहीं महिलाओं के आ जाने से उनकी दुकानदारी भी न फीकी पड़ जाय......


सच पूछिए तो केंद्र या राज्य सरकार के बजट का अब कोई खास मतलब नहीं होता....क्योंकि अब महंगाई बजट में तय नहीं होती....कोई चीज सस्ती होगी....इसके लिए बजट का इंतजार नहीं होता.....अब तो बस औपचारिकता रह गई है ये बजट...मंत्री जी ने साल भर कुछ किया है...किया भी है....ये दिखाने के लिए बजट बनता है...संसदीय सत्र बुलाया जाता है.....इसी बहाने गरमागरम बहस होती है.....लेकिन नतीजा कुछ खास निकलता हो....ऐसा दिखता नहीं....निकले तब तो दिखे....और इसी तरह वित्त मंत्री का ओहदा भी लगता है छोटा हो गया है....क्योंकि इस साल के असली वित्त मंत्री तो शरद पवार हैं.....जिस चीज की कमी का जनाब रोना रोते हैं...उसकती कीमतें आसमान छूने लगती हैं.....अब ये अलग बात है...वो देश के वित्त नहीं बल्कि कृषि मंत्री हैं.....लेकिन रुतबा देखिए....मुंह से किसी खास चीज का नाम निकला.....और अगले दिन से बढ़ने लगे दाम.....और जनाब शरद पवार की भी गलती नहीं है.......वित्त मंत्री इस तरह अगर कुछ नहीं कहते तो गलती उनकी है न....उन्हें कुछ कहना चाहिए.....एक समय था जब लोग साल भीर बजटीय भाषण का इंतजार करते थे....टीवी पर निगाह गड़ाकर सुनते...द्खते थे कि मंत्री जी के मुख से महंगाई के साथ कौन सी चीज का नाम निकला.....दो एक चीजे तो ऐसी थीं जिसकी बजट के कुछेक दिन पहले से खरीदारी शुरू हो जाती थी....लेकिन अब सरकार के तौर तरीके ही बदल गए.....चीजों के दाम जब चाहे बढ़ा दिया.....नहीं बढ़ा हो तो सिर्फ इतना भर कह दो...जनसंख्या के हिसाब से फलां वस्तु देश में कम है...या आने वाले दिनों में किल्लत हो सकती है....वैसे बजट के मतलब बदलने की एक वजह और भी है...बढ़ता शहरीकरण भी इसकी एक वजह है जनाब...चाहे चीजों के दाम कितने भी बढ़ा दो...जिसे खरीदना होगा...खरीदेगा ही...अब जिसके पास पैसे ही न हों ....वैसे भिखमंगों के लिए क्या बजट...क्या आम दिन.....जरुरी हुआ तो खरीदा....नहीं तो उसके बिना ही काम चला लिया..............


आप मानें या न मानें लेकिन मुझे तो कम से कम यही लगता है कि भारत की वित्तीय राजधानी मुंबई मनसे (महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना) और शिव सेना के हाथो बंधक बना हुआ है....इन दोनों पार्टियों के बड़े ओहदेदार नेता जब चाहे जो चाहे कर सकते हैं...कह सकते हैं.....राहुल गांधी की मुंबई यात्रा को कांग्रेसजन ये कहकर भले खुश हो लें कि किसी शिव सैनिक ने उन्हें काला झंडा नहीं दिखाया, किसी ने विरोध नहीं किया....इसका सारा श्रेय जाता है कांग्रेस की सत्ता को...जिसने पूरा जोर लगा दिया कि राहुल गांधी की यात्रा निर्बाध रुप से समाप्त हो जाए....जिससे वो कह सकें कि मुंबई में शिव सेना का कोई वर्चस्व नहीं है....दरअसल राहुल यात्रा ...कांग्रेस सरकार के लिए एक चुनौती थी...जिसे उसने पूरे पुलिस और प्रशासनिक अमले के जोर पर पूरा करा लिया....जबकि हकीकत इसके एकदम उलट है....सरकार माने न माने..मुंबई तो बंधक है..इन तथाकथित दो पार्टियों के हाथों में ...अगर नहीं तो मजाल है कि कोई शिव सैनिक माइ नेम इज खान के पोस्टर फाड़कर ये चेतावनी दे दे कि बिना शाहरुख के माफी मांगे फिल्म रिलीज नहीं होगी.....ये समानांतर सत्ता नहीं तो और क्या है.,...कोई उत्तर भारतीय मुंबई में काम खोजने न आए....ये फरमान क्या समानांतर सत्ता का उदाहरण नहीं....उत्तर भारतीयों को मुंबई में काम करने के लिए मराठी सीखने की बाध्यता का फरमान क्या सरकार के मुंह पर तमाचा नहीं....सरेआम सैकड़ों शिव सैनिक पुलिस की मौजूदगी में नारे लगाते हुए सरकार को चुनौती देते हैं और सरकार एक बेहया औरत की तरह बस ...जांच होगी...पड़ताल करेंगे...दोषियों को सजा देंगे...कहकर अपनी निर्लज्जता छिपाती है.....लगता है मुंबई में शिव सेना और मनसे की सरकार है....और शेष महाराष्ट्र पर कांग्रेस की.....इतिहास में कमजोर शासकों का जिक्र है...लेकिन इन दो पार्टियों की समानांतर सत्ता ये बताने के लिए काफी है महाराष्ट्र में जिस पार्टी की सरकार है वो सिर्फ कांग्रेस के बड़े नेताओं की सुरक्षा कर सकती है ...आम जनता की नहीं....संविधान की नहीं.....राष्ट्रवाद की नहीं.....अभी भी देश की नागरिकता इस बात से निर्धारित होती है कि आप इस देश के वासी है.....इस बात से नहीं कि आप महाराष्ट्र के हैं या फिर बिहार-यूपी के......सरकार बनाना एक बात है...सरकार चलाना दूसरी बात....और सरकार में रहकर एक एक नागरिक की नागरिकता की रक्षा करना उन दोनों से बड़ी बात है......शाहरुख़ ने जो कुछ भी कहा वो गलत था या सही...ये बहस का मुद्दा नहीं...बहस का मुद्दा ये है कि क्या इस देश में बोलने की आजादी नहीं है....या फिर संविधान से बढ़कर हैं ये दोनों पार्टियां......मनसे और शिवसे(ना)...................


लगता है राष्ट्र से बड़ा महाराष्ट्र हो गया है...और उससे भी बड़ा मुंबई....क्योंकि आज तकरीबन हर राजनीतिक पार्टियां इसी बारे में बात कर रही हैं.....पार्टी कोई भी हो.....राष्ट्रीय स्तर की कांग्रेस...या फिर राज्य स्तर की मनसे...या फिर बीजेपी की सहयोगी रही शिव सेना...किसी को राष्ट्र नहीं दिख रहा....सबको दिख रहा है वोट...सबको दिख रही है सत्ता.....राहुल गांधी को उत्तर भारतीयों पर हो रही ज्यादती की चिंता तब आई जब वो बिहार दौरे पर आए...अब बिहार के लोगों को अपने वश में करने के लिए कुछ तो कहना था....सो कह दिया....राहुल गांधी कांग्रेस के बड़े नेता हैं...दांव देखकर पत्ते खोलते हैं.....बाकी की बात ही कुछ और है.....मनसे...यानी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना मन से मराठियों की पक्षधर है....शिव सेना की बात मत कीजिए...नाम शिव का....काम किसी दानव का....क्योंकि शिव की नजर में व्यक्ति के बीच भेदभाव कहां होता है...वैसे शिव के साथ सेना की जरुरत भी बेमानी सी लगती है क्योंकि शिव तो खुद ही सब कुछ कर सकने की क्षमता रखते थे........जहां तक एनसीपी यानी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की बात है तो उसने तो बस नाम के लिए राष्ट्रवादी नां जोड़ रखा है.....बाकी कहीं उसका वजूद है ही नहीं तो नाम में क्या रखा है......हां तो मैं बात कर रहा था राहुल की राह की.....भारत की खोज में निकले राहुल के पांव बिहार पर भी पड़ ही गए.....लेकिन इतने देर से उत्तर भारतीयों की महत्ता बखान करने से क्या फायदा.....जब उनकी ही सरकार ने जब गैर मराठी कानून बनाई थी तब उनकी बोलती बंद क्यों थी.....जनाब भारत की खोज करने नहीं...भारत की राजनीति समझने निकले हैं...जिससे प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा जा सके...लेकिन राहुल जैसे बड़े नेताओं को पता नहीं कि ये जनता है सब जानती है...आप उसे बेवकूफ नहीं बना सकते.....चिदम्बरम ने थोड़ी बहुत हिम्मत दिखाई लेकिन लगता है वो भी दूरदर्शी हैं...बिहार में होने वाले चुनावों की याद लगता है उन्हें भी आ गई है......जो भी हो...आज कोई ,खासकर नेता, समाज के बारे में नहीं सोचता.....आम आदमी के बारे में नहीं सोचता...क्योंकि उसकी नजर होती है वोटों पर....सीटों पर.....सत्ता पर.....और इसके लिए उसकी आवाज उसी तरह बदल जाती है जैसे अमेरिकी नेताओं की...जो भारत में कुछ बोलते हैं और पाकिस्तान पहुंचते ही कुछ और बोलने लगते हैं......मैं दावे के साथ कहता हूं कि अगर निकट भविष्य में राहुल गांधी का मुंबई या महाराष्ट्र का दौरा हुआ तो उनकी आवाज बदल जाएगी या फिर बिहार में कहे गए शब्दों के अर्थ...उनके अनुसार....क्योंकि बिहार अनिश्चित है और महाराष्ट्र में उनकी सरकार विराजमान है सत्ता के पुष्पक विमान पर...........


एक राज ठाकरे को क्यों दोषी ठहराएं....कांग्रेस भी कहां कम है....वो भी मराठी मानुष की आग को हवा देने में साथ दे रही है....अब ये स्थानीय राजनीति की मजबूरी हो या फिर कुछ और लेकिन हकीकत अब कांग्रेस भी देश को क्षेत्रीय आधारों पर नाप तौल समझ रही है......अभी लोग भूले भी नहीं वो दिन जब महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार ने यूपी बिहार के टैक्सी ऑटो ड्राइवरों के लिए मराठी पढ़ना लिखना आने की अनिवार्यता तय की थी.....ये अलग बात है कि बाद में कांग्रेस पर दवाब बढ़ने लगा और सरकार बैक फूट पर आ गई....लेकिन कांग्रेस ने दिखाई राह और एमएनएस कार्यकर्ता उस पर चलने लगे.....एमएनएस की गुंडागर्दी से भला कौन परिचित नहीं....उसी तर्ज पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के ट्रांसपोर्ट विंग के एक नेता ने गांधीगिरी का परिचय देते हुए टैक्सी और ऑटो ड्राइवरों को पुस्तिका वितरित की है...जिसमें उनसे चालीस दिनों के भीतर मराठी सीखने की बाध्यता या यूं कहें धमकी दी गई है.....एमएनएस ने साफ कहा है...मराठी सीखो वर्ना घर वापस भेज दिया जाएगा......क्या इसके लिए कांग्रेस दोषी नहीं.....कहीं एमएनएस और कांग्रेस में आपसी सांठगांठ तो नहीं.....क्योंकि मराठी मानुष के नाम पर हुई अबतक की किसी भी घटना को महाराष्ट्र सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया है......अगर कांग्रेस इसमें एमएनएस को सहय़ोग कर रही है तो ये अखंड भारत के स्वरूप के खिलाफ है और घातक भी....क्योंकि इससे अलगाव बढ़ेगा...समाज में वैमनस्यता भी......और अगर कांग्रेस का दामन पाक साफ है तो एमएनएस को नियंत्रित करने से सरकार घबराती क्यों है.....हिंदीभाषी हों या मराठीभाषी .....अगर उनमें योग्यता है तो वो पूरे देश में कहीं भी नौकरी पा सकते हैं और उन्हें पाना भी चाहिए...ऐसेलोगों को कहीं भी काम करने से रोकने से कोई मना क्यों करे.....लेकिन लगता है एमएनएस हो..शिव सेना हो....या फिर कांग्रेस....वोटों पर ढीली पकड़ उन्हें कुछ कदम उठाने पर मजबूर कर देती है....और साफ साफ पता चल जाता है कि हमाम में सब नंगे हैं.....