
घर से निकलने से पहले
करता हूं आपको प्रणाम
घर से निकलते ही
सोसायटी में कारों पर
देखता हूं आपकी तस्वीर
सिर झुक जाता है
खुद-ब-खुद
कहना नहीं पड़ता
बस में चढ़ा
आगे के शीशे पर दिखी
आपकी
एक नहीं ....कई तस्वीरें
अलग अलग मुद्राओं में
एक बार फिर नमन आपको
बस की खिड़की से
दिखती है
हर रोज आपका मंदिर
मंदिर पर लगा साईनबोर्ड
जिसमें हैं
आपकी अनुपम तस्वीरें
फिर सिर झुक गया
खुद -ब - खुद
ऑफिस में मंदिर है
मंदिर में है
आपकी
झक्क सफेद प्रतिमा
हाथ जुड़ जाते हैं
सिर झुक जाता है
आपको देखकर
बंधती है
एक उम्मीद
जीवन में खुशी का
लोग कहते हैं भगवान कहां है..
मैं तो कहता हूं
हर कहीं है
बस रुप अलग है
देखने वाले की नज़र है
किसी को
हर तस्वीर में नजर आते हैं साईं
किसी को कोई
तस्वीर ही नहीं दिखती
क्या है बसेरा?
वक्त के साथ...
फ़ॉलोअर
कुछ और बसेरे...
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एक मोड़ पर
मैंने देखा
सच का चेहरा
बुझा-बुझा सा
रुखे बाल
सूखापन हर कोने में
पसीने से लथपथ
झुर्रियां भरी जवानी में
धंसी-धंसी आंखें
स्मित विहीन
मैंने सोचा
पुछें...
क्या हाल बना रखा था
पर ..फिर सोचा
जले पर नमक न लगे
छोड़ दिया
अगले मोड़ पर
झुठ मिला
चेहरे पर हों
दीप जले से
ताजा फूलों सा
खिला-खिला सा
गाल गुलाबी
नैन शराबी
हर बात पर
मुस्कान बिखेरता
पूछ ही बैठा
कैसे हो
उत्तर मिला
समय के साथ चलता हूं
और कोई राज नहीं
यही फर्क है
झुठ और सच में
एक समय के साथ
चलता है
एक कोशिश करता है
कोशिस क्या..हिमाकत कहिए
समय को
अपने साथ चलाने की
सच के चेहरे
रुखे सूखे
झुठ के चेहरे
दप दप करते
सच के चेहरे
मुरझाए से
झुठ को देखो
सदा चमकते
सच का क्या है
जो भी है
बस सामने है
आईने की तरह
झुठ की तो
बस पूछो ही मत
दिखता कुछ है
होता है कुछ और
एक चेहरे पर इतने चेहरे
कोई पहचान नहीं सकता
कोई जान नहीं सकता
कुछ तो दिखते
सच की भांति
मिलते जुलते
ऐसे जैसे
बस सच ही हों
अब तो हर शख्स की
नज़रों में झलकता है फरेब
कोई अपना हो या हो गैर
करें किसपे यकीं
हर चेहरे पे
नज़र आती है
मुस्कुराहट झुठी
ठहाके
खोखले से लगते हैं
बस
सच लगता है
तो
आंखों में आंसू
लेकिन
हर कोई
हर किसी के सामने
रोता भी नहीं
हंसने की कोशिश में
निकल आते हैं
कमबख़्त आंसू
किसी के दुख-दर्द में
संवेदनाएं
हो गई है
दिखावे की चीज
लोग भरे गले से
कहते तो
बहुत कुछ हैं मगर
दूर जाते ही
हंसते हैं
परीक्षा में
फेल होने पर
बच्चे
कर लेते हैं आत्महत्या
कर्ज अदा करने में
सक्षम नहीं होने पर
किसान
झूल जाता है फांसी पर
नौकरी छूट जाने पर
कूद जाता है
पाचवीं मंजिल से
कोई
पर
कोई नेता
आज तक
कभी नहीं मरा
भले
हार जाए
लोकसभा का चुनाव
विधानसभा का भी
पार्षद का भी
पंचायत का भी
उसे शर्म
नहीं आती
क्योंकि नेतागिरी
बेशर्मी की हद है
जनता को
बेवकूफ
नहीं बना पाया
बस
सोचकर
चुपचाप रह जाता है
चलो
अगली बार देखेंगे
कैसे बचेगा बच्चु
ट्वेंटी-ट्वेंटी
वर्ल्ड कप में
टीम इंडिया
हार गया
तो क्या हुआ
खेल में
जीतता
कोई एक ही है
हार की हार
स्वीकार करो
हारने वाला ही
अगली बार
जीतने के लिए
उतरता है
मैदान में
जो हारा नहीं
उसे क्या पता
जीत का
असली स्वाद
सुनता रहा हूं
एक मच्छर
बना देता है
आदमी को हिजड़ा
आज सुनिए
एक ग़लत फैसला
नहीं छोड़ता
इंसान को
किसी काम का
सोचिए
आपने
कब लिया
कोई
गलत फैसला