मैं जिस रुट की बस से रोज ऑफिस आता हूं...उसमें अमूमन कई चेहरे जाने पहचाने से लगते हैं.....या यूं कहें तो लगने लगे हैं...रोज उतरने चढ़ने भर का रिश्ता है...कोई किसी को देखकर मुस्कुराता भी नहीं ...बस देखता है...सोचता है....अच्छा आज भी...ऐसे ही एक चेहरा है एक लड़की का.....मॉडर्न सी लड़की का.....चेहरे पर काला चश्मा....गहरे लिपस्टिक रंगे होंठ....हाथ में दो मोबाईल फोन....कान में लगा ईयरफोन.....लड़की मोटी सी है पर हर रोज नए लड़के के साथ.....कोई भी हो....मुझे क्या.....कई बार लड़कों के साथ खुसर-फुसर करते देखा..सट-सटाकर....मुझे क्या.....उस दिन अचानक वो चिल्लाने लगी.....समझ क्या रखा है.....शरीफ लड़कियों को छेड़ते शर्म नहीं आती...ठीक से बैठते नहीं.....पीछे मुड़कर देखा...वही लड़की....नए लड़के के साथ...लड़का चुप था....क्या बोलता......लड़की चिल्लाए जा रही थी......एक यात्री पर.....जिसका पैर जरा छू गया था उसके पैर से....बस्स......अब शरीफ (?) लड़की है तो चिल्लाएगी ही......फिर शरीफ लड़की चुप हो गई.....लड़के से बातचीत में गुम हो गई.....शरीफ जो ठहरी.....मेरा स्टॉप आया...मैं उतर गया......
क्या है बसेरा?
वक्त के साथ...
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कुछ और बसेरे...
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Mohalla Live - Mohalla Live ------------------------------ गाली-मुक्त सिनेमा में आ पाएगा पूरा समाज? Posted: 24 Jan 2015 12:35 AM PST सिनेमा समाज की कहानी कहता है और...11 वर्ष पहले
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स्पोर्ट्स पीरियड में सफाई करवाने से बनेंगे खिलाड़ी? - आज टीवी पर स्कूल के बच्चों को सफाई करते देखा तो अपना टाइम याद आ गया। मगर सफाई के बहाने कोई दूसरी बात ध्यान में आई। मैं 11 साल तक सरकारी स्कूल में पढ़ा हूं...11 वर्ष पहले
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लोग कहते हैं
आजकल
हर शय बिकती है
मैं कहता हूं
नहीं जनाब
आजकल नहीं
सिर्फ आज
कल किसने देखा है
और जो कल
बीत चुका है
उसके बारे में
मुझे कुछ भी कहां पता
मुझे याद है
बचपन के वो दिन
जब
जुगनुओं को पकड़ने के लिए
मचल उठता था मन
किसी पत्ते पर
बैठी तितलियों से
जलन होती थी
ये सोचकर
कि वो
मेरे कमीज पर
क्यों नहीं बैठी
मुझे याद है
बचपन के वो दिन
जब घर के करीब
हलवाई की दुकान पर
मैं रोज जाता था
और मुझे रोज मिलती थी
मिठाई बिना मांगे
क्योंकि मुझे अच्छी लगती थी
जलेबी
और मेरे लिए हर रोज
घर आती थी
गरमागरम जलेबियां
रुपए के बदले में तौलकर अलग
और मेरे नाम से मुफ्त की अलग
मुझे याद है
बचपन के वो दिन
लेकिन अब कहां मिलती हैं
वो रसदार जलेबियां
मिलती भी हैं
तो वो स्वाद कहां
उसमें बचपन की मिठास थी
अब है
जवानी की कड़वाहट
तब हकीकत का तीखापन नहीं था
अब तो हर मिठाई लगती है तीखी
मिर्च से ज्यादा
मुझे याद है
बचपन के वो दिन
भूखे को नजर आती है
हर शय में बस रोटी
आसमां में
जमीं पर
चांद में
नदियों - तालाबों में
क्योंकि
भूख़ से बड़ी
दुनिया में कुछ भी नहीं
न जिस्म काम करता है
न दिमाग सोचता है
न कुछ याद आता है
कुछ देर पहले का भी कुछ
हर गोल चीज
लगती है रोटी की तरह
स्वाद का एहसास भी
होने लगता है
मुंह में पानी आ जाता है
और कुछ देर के लिए
तृप्त हो जाता मन
ये सोचकर
कि अब तो रोटी पास है
(अर्थ मत ढूंढिए)
सूरज की किरणें उदास है
कोई मेरे आसपास है
चांदनी क्यों खोई खोई है
आखिर उसे किसकी तलाश है
जब जीवन का अंत विनाश है
मालिक क्यों कोई दास है
कोई मुझको ये समझाए
क्यों मूल्यों का हो रहा ह्रास है
देख समाज की नित घटनाएं
मन को होता क्यों त्रास है
कोई किसी को नहीं है भाता
तो कोई क्यों खासमखास है
अच्छा ये बतलाओ मुझको
आखिर रोता क्यों आकाश है
वो विशाल है, सबसे ऊपर
आखिर उसे क्या संत्रास है
आज की ताजा ख़बर
जेट पर उड़ेगी माया
78 करोड़ की जेट पर
क्या अजूबा है इसमें
जब माया है
तब जेट भी उसके लिए कम है
क्योंकि माया की माया के क्या कहने
कभी किसी की तुम परवाह मत करना
चोट लगे,दम निकले,पर आह मत करना
कभी किसी की तुम परवाह मत करना
अच्छा हो कितना भी, कुछ भी पर दोस्त मेरे
आम लोगों की तरह वाह वाह मत करना
कभी किसी की तुम परवाह मत करना
जीवन में खुशियां हो, गम हों..जो भी हो
आंसू बहाकर जीवन स्याह मत करना
कभी किसी की तुम परवाह मत करना
किसी बात पर भी अपनी नाराज़गी
भूलकर भी जाहिर सरेराह मत करना
कभी किसी की तुम परवाह मत करना
चोट लगे,दम निकले,पर आह मत करना
कभी किसी की तुम परवाह मत करना